अरावली केवल पर्वत नहीं हमारा रक्षा कवच भी है क्या रेगिस्तान बनने की और बढ़ रहा है राजस्थान

सबसे पहले यह जाने की अरावली की क्या अहमियत है 

  1. ऊपरी अरावली:- दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा । दिल्ली का रायसीना हिल भी अरावली का हिस्सा था ।
  2. मध्य अरावली :- दिल्ली से नीचे राजस्थान तक , उदयपुर क्षेत्र तक फैला हिस्सा ।

निचला अरावली :- गुजरात तक बढ़ने वाला हिस्सा । पूरी अरावली का 80% राजस्थान में है। सबसे उच्ची चोटी गुरुशिखर (1,727 मीटर) माउंट आबू में है ।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से क्या खतरा दिख रहा है?

गुरुग्राम और राजस्थान में अरावली 30 मीटर से भी कम है खनन माफिया पहले  से ही 100 मीटर से थोड़ी ऊपर की पहाड़ियो को काटकर 100 मीटर से नीचे ला रहे हैं ताकि आगे पूरी तरह नष्ट कर सकें। क्योकि अब 100 मीटर से कम अरावली नहीं मानी जाएगी।

जयपुर सुप्रीम कोर्ट ने – हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय की वह परिभाषा मान ली ,जिसमे अरावली पहाड़ियों को सिर्फ भू-भाग माना गया है जिनकी उचाई 100 मीटर से ज़्यादा है इसका मतलब है की अरावली का 90% हिस्सा जो 100 मीटर से कम है अब वह पहाड़ी नहीं माना जाएगा ।

भविष्य में वहाँ खनन के रास्ते खुल सकते है। कोर्ट ने कहा है की वैज्ञानिक मैपिंग से पहले कोई नई खनन जारी नहीं होगी। देखने में यह आदेश सुरक्षात्मक लगता है लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञो के सामने यह बड़ा सवाल है जो अरावली 100 मीटर से नीचे है उसका क्या होगा ।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है की :-

अरावली पर्वत श्रृंखला में 100 मीटर से कम को पहाड़ नहीं मानने को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की और से लगायी गई याचिका को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोला है साथ ही सुप्रीम कोर्ट से भी अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार की माँग की है । गहलोत ने सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि यह फैसला पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि खनन माफियाओ के लिए ‘रेड कार्पेट ‘ है ।

गहलोत ने कहा है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसी रिपोर्ट पेश की है,जिससे अरावली का दायरा सिमट गया है अरावली राजस्थान का केवल पर्वत नहीं हमारा ‘रक्षा कवच’ है केंद्र सरकार की सिफारिश पर इसे 100 मीटर के दायरे में समेटना प्रदेश की 90 फीसदी अरावली के मृत्यु प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने जैसा है सबसे भयावह तथ्य यह है की राजस्थान की 90%अरावली पहाड़िया 100 मीटर से कम है यदि उन्हें परिभाषा से अलग कर दिया गया तो यह केवल नाम बदलना नहीं है बल्कि कानूनी कवच हटाना है इसका यह मतलब है की इन क्षेत्रों में अब वन संरक्षण अधिनियम लागू नहीं होगा और खनन बेरोक-टॉक हो सकेगा ।

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